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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
महाह्रदः सङ्क्षुभित आत्मनैव प्रसीदति |  ५२   क
एतदेवङ्गतस्याहं सुखं पश्यामि केवलम् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति