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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
दुष्करं वत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये |  ९   क
वय़ं त्वेनान्परित्यक्तुमसतोऽपि न शक्नुमः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति