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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
यत्र प्रेतो नन्दति पुण्यकर्मा; यत्र प्रेतः शोचति पापकर्मा |  १४   क
वैवस्वतस्य सदने महात्मन; स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति