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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
ये निष्क्रिय़ा नास्तिकाः श्रद्दधानाः; पापात्मान इन्द्रिय़ार्थे निविष्टाः |  १५   क
यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति