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शान्ति पर्व
अध्याय २१
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देवस्थान उवाच
असाधुनिग्रहरतः साधूनां प्रग्रहे रतः |  १४   क
धर्मे वर्त्मनि संस्थाप्य प्रजा वर्तेत धर्मवित् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति