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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
मन्दाकिनी वैश्रवणस्य राज्ञो; महाभोगा भोगिजनप्रवेश्या |  १८   क
गन्धर्वय़क्षैरप्सरोभिश्च जुष्टा; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति