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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
मेरोरग्रे यद्वनं भाति रम्यं; सुपुष्पितं किंनरगीतजुष्टम् |  २०   क
सुदर्शना यत्र जम्वूर्विशाला; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति