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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
ये व्राह्मणा मृदवः सत्यशीला; वहुश्रुताः सर्वभूताभिरामाः |  २१   क
येऽधीय़न्ते सेतिहासं पुराणं; मध्वाहुत्या जुह्वति च द्विजेभ्यः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति