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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
यत्रोत्तराः कुरवो भान्ति रम्या; देवैः सार्धं मोदमाना नरेन्द्र |  २५   क
यत्राग्निय़ौनाश्च वसन्ति विप्रा; ह्ययोनय़ः पर्वतय़ोनय़श्च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति