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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
स्वदारिणां धर्मधुरे महात्मनां; यथोचिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् |  ३७   क
धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति