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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
निवाते तु यथा दीपो ज्वलेत्स्नेहसमन्वितः |  १९   क
निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद्युक्तमाहुर्मनीषिणः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति