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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
ये राजानो राजसूय़ाभिषिक्ता; धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् |  ४१   क
ये चाश्वमेधावभृथाप्लुताङ्गा; स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति