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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतदः समां समां; यो गोशती दश दद्याच्च शक्त्या |  ४३   क
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां; पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति