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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
प्रभासं मानसं पुण्यं पुष्कराणि महत्सरः |  ४५   क
पुण्यं च नैमिषं तीर्थं वाहुदां करतोय़िनीम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति