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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
गय़ां गय़शिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् |  ४६   क
तूष्णीङ्गङ्गां दशगङ्गां महाह्रदमथापि च ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति