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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
गौतमीं कौशिकीं पाकां महात्मानो धृतव्रताः |  ४७   क
सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये प्रय़ान्ति च ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति