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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः |  ४८   क
प्रय़ान्ति पुण्यगन्धाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति