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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
न द्वेष्यो न प्रिय़ः कश्चिन्न वन्धुर्न रिपुस्तथा |  ५०   क
न जरामरणे वापि न पुण्यं न च पातकम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति