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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
निर्मुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो कृतात्मानो यतव्रताः |  ५२   क
अध्यात्मय़ोगसंस्थाने युक्ताः स्वर्गगतिं गताः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति