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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
वुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं; व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा |  ५५   क
कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदा चि; दकार्षं ते मनसोऽभिषङ्गात् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति