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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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शक्र उवाच
यस्मादिमं लोकपथं प्रजाना; मन्वागमं पदवादे गजस्य |  ५६   क
तस्माद्भवान्प्रणतं मानुशास्तु; व्रवीषि यत्तत्करवाणि सर्वम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति