अनुशासन पर्व  अध्याय १०५

गौतम उवाच

शिवं सदैवेह सुरेन्द्र तुभ्यं; ध्याय़ामि पूजां च सदा प्रय़ुञ्जे |  ५९   क
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व; त्वय़ा दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ||  ५९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति