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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं सर्वतो मदम् |  ६   क
धृतराष्ट्रस्य रूपेण शक्रो जग्राह हस्तिनम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति