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विराट पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
तां मृगीमिव वित्रस्तां दृष्ट्वा कृष्णां समीपगाम् |  २१   क
उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लव्ध्वेव पारगः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति