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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
ततस्ते पितुराज्ञाय़ दिक्षु सर्वासु तं हय़म् |  १२   क
अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति