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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
ततस्ते सागराः सर्वे समुपेत्य परस्परम् |  १३   क
नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति