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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलय़ोऽग्रतः |  १४   क
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा |  १४   ख
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति