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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
एवं हि खनतां तेषां समुद्रं मकरालय़म् |  २३   क
व्यतीतः सुमहान्कालो न चाश्वः समदृश्यत ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति