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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते |  २४   क
विदार्य पातालमथ सङ्क्रुद्धाः सगरात्मजाः |  २४   ख
अपश्यन्त हय़ं तत्र विचरन्तं महीतले ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति