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वन पर्व
अध्याय १०५
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लोमश उवाच
त्रिदशांश्चाप्यवाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् |  ४   क
सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति