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शान्ति पर्व
अध्याय २०९
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गुरुरु उवाच
व्यापकं सर्वभूतेषु वर्ततेऽप्रतिघं मनः |  १३   क
मनस्यन्तर्हितं द्वारं देहमास्थाय़ मानसम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति