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उद्योग पर्व
अध्याय १०५
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नारद उवाच
सुहृद्भवान्मम मतः सुहृदां च मतः सुहृत् |  १७   क
ईप्सितेनाभिलाषेण योक्तव्यो विभवे सति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति