उद्योग पर्व  अध्याय १०५

नारद उवाच

कुतो मे भोजनश्रद्धा सुखश्रद्धा कुतश्च मे |  ४   क
श्रद्धा मे जीवितस्यापि छिन्ना किं जीवितेन मे ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति