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उद्योग पर्व
अध्याय १०५
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नारद उवाच
अहं पारं समुद्रस्य पृथिव्या वा परं परात् |  ५   क
गत्वात्मानं विमुञ्चामि किं फलं जीवितेन मे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति