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उद्योग पर्व
अध्याय १०५
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नारद उवाच
सुहृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणय़मीप्सितम् |  ७   क
प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति