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भीष्म पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
कथं शिखण्डी गाङ्गेय़मभ्यधावत्पितामहम् |  १   क
पाञ्चाल्यः समरे क्रुद्धो धर्मात्मानं यतव्रतम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति