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भीष्म पर्व
अध्याय १०५
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधन विजानीहि स्थिरो भव विशां पते |  २४   क
पूर्वकालं तव मय़ा प्रतिज्ञातं महावल ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति