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वन पर्व
अध्याय २२५
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा यमौ चाप्यसुखौ सुखार्हौ; समृद्धरूपावमरौ दिवीव |  १४   क
प्रजागरस्थौ ध्रुवमप्रशान्तौ; धर्मेण सत्येन च वार्यमाणौ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति