वन पर्व  अध्याय १५८

वैशम्पाय़न उवाच

साहसाद्यदि वा मोहाद्भीम पापमिदं कृतम् |  १०   क
नैतत्ते सदृशं वीर मुनेरिव मृषावचः ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति