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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
तत्र कृत्यमहं मन्ये सैन्धवस्याभिरक्षणम् |  १३   क
स नो रक्ष्यतमस्तात क्रुद्धाद्भीतो धनञ्जय़ात् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति