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विराट पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति |  ९   क
आश्वास्य पाय़यित्वा च परिप्लाव्य च वाजिनः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति