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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
यत्र ते परमेष्वासा यत्ता रक्षन्ति सैन्धवम् |  २०   क
तत्र याहि स्वय़ं शीघ्रं तांश्च रक्षस्व रक्षिणः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति