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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
न हि मद्वीर्यमासाद्य फल्गुनः प्रसहिष्यति |  ५९   क
यथा वेलां समासाद्य सागरो मकरालय़ः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति