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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
परिश्रान्तं गतं भूमौ कृत्वा कर्म सुदुष्करम् |  ४८   क
तवान्तेवासिनं शूरं पालय़ार्जुन सात्यकिम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति