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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्योत्तमौजसः |  २८   क
जघान चतुरश्चाश्वानुभौ च पार्ष्णिसारथी ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति