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वन पर्व
अध्याय २९४
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वं हि देवेश्वरः साक्षात्त्वय़ा देय़ो वरो मम |  १५   क
अन्येषां चैव भूतानामीश्वरो ह्यसि भूतकृत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति