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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वासुदेवोऽपि वीर्यवान् |  १   क
उपाय़ाद्वृष्णिभिः सार्धं पुरं वारणसाह्वय़म् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति