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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
पाञ्चालानां तु मुख्यौ तौ राजपुत्रौ महावलौ |  ३६   क
रथमन्यं समारुह्य धनञ्जय़मभीय़तुः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति