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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
यथा श्रुतिरिय़ं व्रह्मञ्जीवः किल सनातनः |  २३   क
शरीरमध्रुवं लोके सर्वेषां प्राणिनामिह ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति