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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
न यज्ञाध्ययने दानं निय़मास्तारय़न्ति हि |  ६१   क
तथा सत्यं परे लोके यथा वै पुरुषर्षभ ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति